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डॉ.पीएन सिंह के शोक में प्रबुद्धजनों ने यह लिखा…

गाजीपुर। प्रख्यात समालोचक एवं शिक्षाविद् डॉ.पीएन सिंह के निधन से प्रबुद्धजन कुछ ज्यादा ही शोकाकुल हैं। कई लोगों ने सोशल मीडिया अथवा अन्य प्लेटफार्म के माध्यम से लिखकर अपनी संवेदना जताई है। बल्कि उनका यह लेखन एक तरह से डॉ. पीएन सिंह के व्यक्तित्व की विवेचनात्मक और संस्मरणात्मक रपट है। उनके कुछ अंश ‘आजकल समाचार’ अपने सुधि पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है।

जाने माने पत्रकार और प्रमुख दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान के संपादक मंडल के वरिष्ठ सदस्य रहे राजीव सिंह लिखते हैं-सुप्रसिद्ध समीक्षक और साहित्यकार डॉ. पीएन सिंह के निधन से हिंदी साहित्य ने एक सचेत, प्रबुद्ध, प्रगतिशील लेखक खो दिया। ग़ाज़ीपुर जैसे पूर्वांचल के पिछड़े जिले में रहते हुए उन्होंने देश भर में अपने साहित्य लेखन की अलख जगाए रखी। उनकी पुस्तक ‘नायपाल का भारत’ देश के साहित्य जगत में चर्चित रही। यह पुस्तक उनके चिंतन-अनुचिंतन का निष्कर्ष था। लंबे समय तक बतौर अध्यक्ष प्रगतिशील लेखक संघ को अपनी सेवाए दीं। अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक होने के बाद भी उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। अवकाश प्राप्त करने के बाद वे साहित्य सृजन में जुटे रहे और उन्होंने  लेखन का महत्वपूर्ण काम अवकाश लेने के बाद किया। पक्षाघात के बाद उनका शरीर काम नहीं करता था पर दिमाग़ काम करता रहा। वे जीवन पर्यन्त लिखने-पढ़ने के काम में व्यस्त थे। उन्होंने 1991 में ‘समकालीन सोच’ नाम की हिंदी पत्रिका शुरू की थी जो हाल तक प्रकाशित होती रही है। डा. पीएन सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी पुस्तकें और पत्रिका नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करती रहेगी।

शिक्षाविद् डॉ.आनंद सिंह ने अपने फेसबुक हैंडल पर हैज टैग लगाकर लिखा है-# स्मरण को पाथेय बनने दो# -डॉ पी एन सिंह-विमर्श के वैभव! ग़ाज़ीपुर के गौरव! अंग्रेज़ी साहित्य के अति विद्वान प्राध्यापक। कॉडवेल पर जिनकी थीसिस पढ़ कर इंटरव्यू बोर्ड ओवेशन में खड़ा हो गया। अनुपम वक्ता, जिनके मुख से वक्तव्य इस तरह झरते थे कि श्रोता वाग्मिता में बह जाएं। उन्हें एक बार भी सुनकर कोई उन्हें भूल नहीं सकता था…।

प्रमुख इतिहासकार एवं शिक्षाविद् उबैदुर्रहमान लिखते हैं-शाम वहीं , शहर वहीं …. पर तुमसा अब कहा? फोन बजा…उठाया, आवाज जो थी उसमें अथाह कपकपाहट सी थी जिसके शब्द न् समझ मे आने वाले थे। बस इतना समझ मे आया कि “मैं पी एन सिंह हूँ “…और आगे कि…मेरे ऊपर लेख दो, मालूम नहीं संपादक मंडल मे से किसी ने संपर्क किया है या नहीं?” यह सुनकर थोड़ा मैं असहज सा हुआ कि जिस शख्शियत की पहचान पुर्वांचल मे एक बेहतरीन प्रखर वक्ता के रूप मे पहचान थी और आज ऐसी आवाज कि शब्द भी लाचार है. दरअसल, उन्होंने अपनी पुस्तक ” गाजीपुर के गौरव बिंदु साहित्य “(पृष्ठ 8 ) मे लिखा था कि मार्च 2008 को पक्षपात का शिकार हुआ और उसी समय से बीमार हूँ .”…डॉ. पीएन सिंह एक ऐसे लोक धर्मी थे, जिनके लेखन को देखकर लगता है कि जो उनके बदौलत कभी एक परम्परा जीवित थी , जो अब नहीं रही। यह उनके गहरे और गंभीर अद्ध्यन्शिल्ता और अप्रियतम् हुनर का परिणाम था…। अपने ना रुकने वाले अश्रुओं से एक श्रृद्धांजलि कि एक सच्चा आलोचक ,समालोचक, सर्जक,पारस धर्मी , बुद्ध धर्मी और बुद्धजीवी ना रहा।

शिक्षण संस्थान  द पीआईएसएक के निदेशक माधव कृष्ण ने लिखा है–प्रमाणपत्र पर हिंदी नाम गलत हुआ और इस तरह से परमानंद सिंह परमा नंद सिंह हो गये और गाज़ीपुर को पी एन सिंह मिले। डॉ पी एन सिंह भावुकता पर बौद्धिकता को तरजीह देते थे। उनके निधन से समूचा साहित्य जगत मर्माहत है। उनकी मृत्यु पर आये भावुक संदेशों में उन्हें गाजीपुर का अंतिम साहित्यिक स्तम्भ और वामपंथ का अंतिम योद्धा इत्यादि कहा गया। अपने समूचे लेखकीय जीवन में वह भावनात्मक अतिरंजना को अच्छे लेखन का शत्रु मानते रहे। मंचीय काव्य प्रस्तुतियों में उन्हें साहित्य नहीं दिखता था। यह सच है कि उनके जीवित रहते ही, यहाँ के साहित्य जगत में उनके नाम पर एक कल्ट या पंथ बन चुका था। इसे वह हल्की मुस्कान के साथ स्वीकार करते थे…।

यह भी पढ़ें–डॉ.पीएन सिंह पंचतत्व में विलीन

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