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यूपी कॉलेज भूला अपने पूर्व चेयरमैन की पुण्यतिथि

पुण्यतिथि 23 दिसंबर पर विशेष

  • याद आए प्रोफेसर वासुदेव सिंह, लोगों ने दी श्रद्धांजलि
  • राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास और ईमानदारी के लिए थे लोकप्रिय
  • वाराणसी के यूपी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद आगे चलकर इसी कॉलेज के चेयरमैन बने
  • राष्ट्रभाषा हिंदी के नाम पर कभी समझौता नहीं किया
  • पूर्व कैबिनेट मंत्री ने पीएम राजीव गांधी को हिंदी बोलने के लिए किया था प्रेरित                                                       

वाराणसी (एके लारी)। राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास और अपनी ईमानदारी के लिए लोकप्रियता हासिल करने वाले प्रोफेसर सिंह का जन्म 30 मार्च 1917 में प्रतापगढ़ जिले के पट्टी विधानसभा क्षेत्र के मगरौरा ब्लाक के उतरास गांव में एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय परिवार में हुआ था।

बुधवार को सिकरौल क्षेत्र में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अखिलानंद मिश्र के आवास पर आयोजित गोष्ठी में शहर के गणमान्य लोगों ने वासुदेव सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की।

वर्ष 1933 में इंटरमीडिएट की परीक्षा वाराणसी के उदय प्रताप सिंह कॉलेज से पास की। आगे चलकर इसी वाराणसी स्थित उदय प्रताप कॉलेज के चेयरमैन भी बने।

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय प्रोफेसर वासुदेव सिंह  ने मातृभाषा हिंदी के साथ कभी समझौता नहीं किया। हिंदी भाषा को उसका स्थान दिलाने के लिए और संघर्ष करने के लिए तत्काल मंत्रिमंडल तक उन्होंने छोड़ दिया था।

वर्ष 1946 में श्री सिंह प्रताप बहादुर कॉलेज प्रतापगढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्ता पद  से त्यागपत्र देकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई और जेल गए वर्ष 1947 में भारत-पाक विभाजन के समय भारत सरकार के अवैतनिक फ्लाइट ऑफिसर के रूप में मुस्लिम शरणार्थियों को पाकिस्तान पहुंचाया और वहां घिरे हिंदू शरणार्थियों को हवाई जहाज से भारत ले आए।

राष्ट्रभाषा से प्रेम

रूस के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव भारत की यात्रा पर आए सदन के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को उन्होंने रशियन भाषा में संबोधित किया। कुछ समय बाद भारत महोत्सव का आयोजन रूस में हुआ है तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी समारोह के मुख्य अतिथि थे। वहां उन्होंने लगातार हर जगह अंग्रेजी में ही भाषण दिया। रशियन राष्ट्रपति ने विदेश में अपनी मातृभाषा इस्तेमाल किया है जबकि भारतीय प्रधानमंत्री ने अंग्रेजी भाषा का सहारा लिया। इस पर प्रोफेसर सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री को भी रशियन राष्ट्रपति की तरह विदेश में मातृभाषा हिंदी का इस्तेमाल करना चाहिए था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसका सम्मान करते हुए सार्वजनिक समारोह में हिंदी बोलने के प्रयास को तेज कर दिया। फिर कुछ समय बाद इंग्लैंड और फ्रांस में हुए भारत महोत्सव में भारतीय भाषा का इस्तेमाल किया।

उर्दू भाषा का नहीं गैर संवैधानिक विधेयक का था विरोध

संविधान के अनुसार कोई भी भाषा उस राज्य की राजभाषा तभी बन सकती है जब उसको बोलने वाले और इस्तेमाल करने वालों की संख्या कुल आबादी का 20% हो। जबकि उत्तर प्रदेश में उस वक्त कुल मुस्लिम आबादी ही मात्र 9 से 13% के मध्य थी। ऐसे में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया जाना गैर संवैधानिक था इसलिए प्रोफ़ेसर वासुदेव सिंह ने उस विधेयक का विरोध किया जो संविधान के अनुसार नहीं था। प्रोफेसर सिंह की ईमानदारी और इस घटना के चलते इंदिरा गांधी की नजरों में उनका स्थान काफी ऊंचा हो गया और उन्होंने उन्हें कई अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपी गई। ।

ईमानदारी की मिसाल थे

लगभग 30 वर्ष सरकार के किसी न किसी पदों पर रहने के बावजूद आने वाली पीढ़ी के लिए वह एक घर तक नहीं बनवा सके और ना ही कोई वाहन खरीद सके।

परिचय

अध्यक्ष, विधानसभा उत्तर प्रदेश। कैबिनेट मंत्री, उत्तर प्रदेश शासन। उपाध्यक्ष, विधानसभा, उत्तर प्रदेश। सदस्य विधान सभा, उत्तर प्रदेश। संस्थापक अध्यक्ष उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी। अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान। चेयरमैन उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी। अध्यक्ष भारत-नेपाल मैत्री संघ। उपाध्यक्ष भारत – रूस मैत्री संघ, भारत – कोरिया मैत्री संघ भारत – अरब संस्कृतिक परिषद

रचनाएं 

जंबूद्वीप, भारत पर चीन का आक्रमण और हिंदी की बात। हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित

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