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बसपा की सोशल इंजीनियरिंग बेमतलबः ओमप्रकाश राजभर

गाजीपुर। सुभासपा अध्यक्ष व पूर्व मंत्री ओमप्रकाश राजभर बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को बेमतलब मानते हैं। उनका कहना है कि बसपा लाख कवायद कर ले मगर पिछड़े और अति पिछड़े उसकी ओर आकर्षित नहीं होने वाले हैं।

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मऊ के वरिष्ठ नेता भीम राजभर को बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के सवाल पर एक न्यूज पोर्टल से बातचीत में सुभासपा अध्यक्ष ने कहा कि भले इसके पीछे बसपा की मंशा राजभर सहित अन्य पिछड़ी और पिछड़ी बिरादरी को अपनी ओर रिझाने की हो मगर उसके लिए यह दूर की कौड़ी है। हकीकत यही है कि बसपा का जनाधार लगातार खिसक रहा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा सहित सपा को पिछड़े और अति पिछड़ों ने साफ नकार दिया था। कारण इन दोनों पार्टियों ने उनकी अनदेखी की थी। उसका सीधा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला। वही दशा साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हुई। हालिया विधानसभा उप चुनाव तक में अति पिछड़ों और पिछड़ों ने बसपा को नहीं पूछा है। उधर बिहार विधानसभा चुनाव में भी असदुद्दीन ओवैसी, उपेंद्र कुशवाहा, सुभासपा संग गठबंधन में बसपा शामिल रही। राजभर वोट बटोरने के लिए बसपा के चुनींदे राजभर नेता भी काम नहीं आए। बल्कि इसके लिए इस गठबंधन को अपने प्रचार अभियान में ओमप्रकाश राजभर का ही नाम लेना पड़ा।

बिहार की तरह साल  2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी उस गठबंधन के प्रयोग के सवाल को बारिकी से टालते हुए सुभासपा अध्यक्ष ने कहा कि बसपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर का खुद अपनी बिरादरी में कोई सियासी वकत नहीं है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में वह अपने गृह जिला मऊ से चुनाव लड़े थे लेकिन हार गए जबकि राजभर साथ दिए होते तो वह बाजी अपने पक्ष में पलटने में कामयाब हो जाते। तब उनके मुकाबले में मुख्तार अंसारी थे और चुनाव अभियान राजभर बनाम मुसलमान हो गया था। बावजूद मुख्तार अंसारी को अपने तत्कालीन कौएद और सुभासपा के गठबंधन का सीधा लाभ मिला था। राजभर वोटर भीम राजभर को छोड़ कर मुख्तार अंसारी के पक्ष में लामबंद हो गए थे।

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