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डीपीआरओ को लेकर आपस में मूंछ फंसाए एमएलए और एमएलसी

गाजीपुर। डीपीआरओ अनिल सिंह के निलंबन पर ग्राम प्रधान भले ही अपनी मूंछे ऐंठ रहे हों लेकिन मूंछों की असल लड़ाई एक एमएलसी और एमएलए के बीच फंस गई है।

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एमएलसी अनिल सिंह के शुरू से पैरोकार हैं। उनकी पूरी कोशिश है कि अनिल सिंह की न सिर्फ फिर बहाली हो बल्कि वह दोबारा गाजीपुर डीपीआरओ बनें। उधर एमएलए अनिल सिंह के निलंबन का श्रेय ग्राम प्रधानों की लंबी लड़ाई को देने के बजाए खुद ले रहे हैं। अपनों के बीच वह निलंबन की कार्रवाई की लाइव स्टोरी सुनाते हैं और उसमें अपनी भूमिका को अहम करार देते हैं।

मालूम हो कि ग्राम प्रधानों ने अपने संगठन के बैनर तले एकजुट होकर अनिल सिंह के विरुद्ध जंग-ए-एलान कर दिया था। उसी बीच शासन ने सात सितंबर को डीपीआरओ के पद से अनिल सिंह को निलंबित कर दिया। ग्राम प्रधानों ने उसे अपनी जंग का नतीजा बताने में रंच मात्र भी देर नहीं की थी जबकि पंचायतराज विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज सिंह की ओर से जारी निलंबन आदेश में इस कार्रवाई का कारण ग्राम पंचायतों में कोरोना किट की खरीद में अनियमितता बताया गया। लगे हाथ इसी मामले में सुल्तानपुर के डीपीआरओ भी निलंबित हुए थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने इस पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी गठित कर दी और गाजीपुर सहित सुल्तानपुर के तत्कालीन डीएम को भी हटा दिया गया।

अब खबर है कि एसआईटी की जांच लगभग अंतिम चरण में है और अनिल सिंह भी एसआईटी के सामने पेश होकर अपनी बेगुनाही के दस्तावेजी सबूत भी  दे चुके हैं। अनिल सिंह के करीबियों को पक्का यकीन है कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट में वह पूरी तरह पाक-साफ साबित होंगे और उनकी कुर्सी फिर वापस होगी। जाहिर है कि ऐसा हुआ तो उनके पैरोकार एमएलसी की मूंछ टाइट होगी। तब यह भी देखा जाएगा कि अनिल सिंह वापसी कर गाजीपुर दोबारा लौटेंगे या नहीं। वैसे उनके निलंबन के बाद शासन ने न तो गाजीपुर डीपीआरओ पद पर उसी कॉडर के अधिकारी की स्थाई नियुक्ति की है न किसी को कार्यवाहक ही बनाया गया है। पंचायतराज विभाग पर नजर रखने वाले इसे भी एमएलसी के प्रभाव से जोड़ कर देख रहे हैं।

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