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एमएलसी चुनाव: तब स्नातक सीट पर भाजपा का यहां मरा पानी!

गाजीपुर। एमएलसी चुनाव में वाराणसी खंड की स्नातक सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई। वाराणसी में शनिवार की दोपहर अंतिम और 22वें राउंड की मतगणना के बाद सपा उम्मीदवार आशुतोष सिन्हा भाजपा के केदारनाथ सिंह पर 3850 वोट के फासले से अपनी जीत दर्ज कराए।

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केदारनाथ सिंह की यह हार भाजपा के लिए करारा झटका है। यह सीट गैर भाजपा दलों के लिए अजेय मानी जाने लगी थी। यहां तक कि इस बार चुनाव अभियान शुरू होने तक इस अजेयता को लेकर न सपा में कोई संशय दिख रहा था न खुद भाजपा ही इसके लिए आशंकित जान पड़ रही थी। शायद यही वजह रही कि भाजपा के अभियान में वह आक्रमकता नहीं दिखी जिसके लिए वह जानी जाती है। अलबत्ता, सपा नेताओं को चुनाव अभियान के अंतिम चरण में यह अंदाजा मिल गया कि इस बार वह बाजी पलटने की स्थिति में आ गए हैं। उसके बाद तो गाजीपुर में पार्टी के सारे दिग्गज अभियान में कूद गए।

अब जबकि चुनाव परिणाम लगभग आ चुका है तब इसको लेकर हर जगह खासकर सपा तथा भाजपा में मंथन भी शुरू हो गया है। सपा से जुड़े राजनीतिक प्रेक्षक अपनी जीत के कारणों में एक प्रमुख कारण मतदाता सूची में निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता को भी मान रहे हैं। पिछले चुनावों में मतदाताओं के नवीनीकरण का काम जैसे-तैसे हो जाता था। उसके बाद फॉल्स वोटिंग कराने की गुंजाइश बन जाती थी लेकिन इस बार मतदाताओं को सूची में नाम दर्ज कराने के लिए जरुरी प्रमाण पत्र के साथ आधार कार्ड तक देने पड़े थे। नतीजा भाजपा उम्मीदवार के वोट के ‘ठेकेदारों’ को मनमानी करने का मौका नहीं मिला। यही कारण रहा कि गाजीपुर में मात्र 39.31 फीसद ही वोट पड़ पाया।

इधर भाजपा से जुड़े राजनीतिक प्रेक्षकों की मानी जाए तो पार्टी की हार का मुख्य कारण कार्यकर्ताओं की घोर उदासीनता है। चुनाव अभियान के दौरान पार्टी की बैठक, सम्मेलन में कार्यकर्ता भागीदारी तो करते रहे मगर उसके बाद वह घर बैठ जाते रहे। कार्यकर्ताओं की इस उदासीनता के लिए खुद पार्टी उम्मीदवार केदारनाथ सिंह ही जिम्मेदार कहे जा  सकते हैं। कार्यकर्ताओं की आपसी बातचीत में भी यही तथ्य सामने आ रहा है। केदारनाथ सिंह एमएलसी रहते आम कार्यकर्ताओं की अपेक्षा तो दूर उनसे संवाद तक के लिए वक्त नहीं निकाल पाते थे। उनकी विधायक निधि से कहां और कौन कार्य होते थे। इससे भी आम कार्यकर्ता अनजान ही रहते थे। बताते हैं कि गाजीपुर में केदारनाथ सिंह के रायदिहंदों में एक वरिष्ठ नेता के पुत्र और दूसरा शिक्षा माफिया व विवादास्पद युवा नेता था। जाहिर है कि इन दोनों का जनाधार क्या पार्टी कार्यकर्ताओं तक में पकड़ नहीं है।

इसके अलावा केदारनाथ सिंह की हार का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि इस बार के चुनाव में उतरने को लेकर अगड़ी जाति का कोई दमदार चेहरा इच्छुक नहीं था। लिहाजा मतदाता सूची में अगड़ी जाति के लोगों का नाम अपेक्षाकृत कम ही दर्ज हो पाया जबकि पिछले चुनावों में अगड़ी जाति के कई चेहरे उतरते रहे और वह खुद मेहनत कर मतदाता सूची में अगड़ों के नाम दर्ज करवाते रहे। वैसे मतदाताओं का पहला नहीं तो दूसरे वरियता के वोट भाजपा के केदारनाथ सिंह को मिल जाया करते थे। जाहिर है कि उस लाभ से भी भाजपा के केदारनाथ सिंह इस बार वंचित हो गए और लगातार चौथी बार विधान परिषद में पहुंचने का उनका सपना टूट गया।

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